चना खाने के फायदे और घरेलु आयुर्वेदिक उपयोग

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चना एक परम उपयोगी पदार्थ है। कहा भी जाता है―'जो खाये चना, सदा रहे बना'―अर्थात् चना इतना गुणकारी है कि इसके प्रयोग से सभी रोग दूर रहते हैं और शरीर तन्दुरुस्त बना रहता है। चना गर्म व रुक्ष प्रकृति का होता है। इसके प्रयोग से नजला, डायबिटीज और वीर्य सम्बन्धी रोगों में लाभ होता है। जिगर, तिल्ली तथा गुर्दे के रोगों में चने का शोरबा (तरी या जलांश) बेहद गुणकारी है। 

यों तो चना गुणकारी है और इसका नियमित प्रयोग करना चाहिये लेकिन ज्यादा मात्रा में खाने से यह भूख को कम कर देता है। अतः एक बार में 100-150 ग्राम से ज्यादा नहीं खाना चाहिये। चना हमेशा खूब चबा–चबाकर खाना चाहिये। 

आज इस लेख में हम यहाँ चने के कुछ घरेलु आयुर्वेदिक उपयोग और फायदे की जानकारी देने जा रहे है :

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चना खाने के फायदे और घरेलु आयुर्वेदिक उपयोग 

भारत में चना का उपयोग सदियों से चला आ रहा हैं। शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने के लिए इसका सेवन किया जाता हैं। 
  • डायबिटीज (मधुमेह) : 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर प्रातः निराहार सेवन करने से मधुमेह व्याधि दूर होती है। यदि जौ और चना–दोनों को मिलाकर और उसका आटा पिसवाकर उसकी रोटी भी रोज खाई जाये तो जल्दी लाभ होगा।
  • नपुंसकता : भिगोये हुए चने के जल में (चना निकाल लेने के बाद में जो जल रह जाये उसमें) शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है और स्तम्भन–शक्ति बढ़ती है ।
  • कफ-प्रकृति : रात्रिकाल में सोते समय भुने हुए चने चबाकर ऊपर से गुनगुना दूध पीने से श्वास–नली के अनेक रोग–बलगम, कफ आदि दूर हो जाते हैं। यह प्रयोग करने के बाद पानी न पीयें।
  • खूनी बवासीर : गर्म-गर्म भुने चनों का सेवन नियमित रुप से कुछ दिनों तक करते रहने से प्रारम्भिक स्थिति का खूनी बवासीर ठीक हो जाता है।
  • गर्भपात : गर्भपात की संभावना हो तो नारी को काले चने का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिये, गर्भ स्थिर बना रहेगा।
  • प्रदर : भुने हुए चनों में देशी खाँड मिलाकर रख लें । 2–3 चम्मच की मात्रा में खाकर ऊपर से देशी घी मिश्रित गाय का गर्म दूध पीने से कुछ दिनों के बाद ही श्वेत प्रदर (सफेद पानी आना) बंद हो जाता है।
  • वीर्यवर्धक योग : मिट्टी, चीनी–मिट्टी या काँच के बर्तन में आवश्यकतानुसार चने रात में भिगो दें और प्रातः खूब चबा–चबाकर खायें। इस प्रकार कई दिनों तक खाते रहने से वीर्य की वृद्धि होती है और वीर्य सम्बन्धी अनेक विकार समाप्त हो जाते हैं।
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